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देवशयनी एकादशी व्रत विधि, तुलसी और शालिग्राम का पूजन

Dev Shyni Gyaras

देवशयनी एकादशी (जिसे हरिशयनी एकादशी, पद्मा एकादशी या आषाढ़ी एकादशी भी कहा जाता है) हिन्दू पंचांग के अनुसार आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को मनाई जाती है। यह एकादशी विशेष रूप से भगवान विष्णु के शयन (निद्रा) में जाने का प्रतीक है और इसका बहुत धार्मिक महत्व होता है।


देवशयनी एकादशी 2025 में कब है?

  • तिथि: शनिवार, 5 जुलाई 2025
  • एकादशी तिथि आरंभ: 4 जुलाई 2025 को रात्रि 11:26 बजे
  • एकादशी तिथि समाप्त: 5 जुलाई 2025 को रात्रि 10:05 बजे

महत्व और मान्यता:

1.  भगवान विष्णु का योगनिद्रा प्रवेश:
इस दिन से भगवान विष्णु क्षीर सागर में शेषनाग की शैय्या पर चार महीनों के लिए योगनिद्रा में चले जाते हैं। इसे "चातुर्मास" की शुरुआत माना जाता है।

2.  शुभ कार्यों पर विराम:
देवशयनी एकादशी से लेकर देवउठनी एकादशी (कार्तिक शुक्ल एकादशी) तक के समय को "चातुर्मास" कहा जाता है। इस अवधि में शादी, गृह प्रवेश, मुंडन, नामकरण आदि शुभ कार्य नहीं किए जाते

3.  पुण्यफल:
इस दिन व्रत रखने और विष्णु पूजा करने से हजारों वर्षों के यज्ञ, दान और तीर्थ के बराबर फल प्राप्त होता है। यह व्रत पापों का नाश करता है और मोक्ष की प्राप्ति कराता है।


यहाँ पर देवशयनी एकादशी की पूर्ण कथा (व्रत कथा) विस्तार से दी जा रही है, जो पद्म पुराण में वर्णित है। यह कथा भगवान श्रीहरि विष्णु के एक भक्त राजा मान्धाता और एक ऋषि संवाद के रूप में प्रकट होती है।


देवशयनी एकादशी व्रत कथा (पूर्ण कथा):

प्राचीन काल की बात है, इक्ष्वाकु वंश में उत्पन्न एक महान धर्मात्मा राजा मान्धाता राज्य करते थे। वे बड़े तपस्वी, सत्यवादी, प्रजावत्सल और विष्णुभक्त थे। उनके राज्य में सभी सुखी थे, परंतु एक बार राज्य में तीव्र अकाल पड़ गया। वर्षा नहीं हुई, नदियाँ सूख गईं, फसलें नष्ट हो गईं और प्रजा अन्न-जल के बिना तड़पने लगी।

राजा ने बहुत से दान, यज्ञ, पूजा करवाईं, फिर भी कोई लाभ नहीं हुआ। चिंतित राजा एक दिन मुनियों से पूछने निकले कि यह संकट क्यों आया है।

महर्षि अंगिरा का उपदेश:

वहां उन्होंने महर्षि अंगिरा को तपस्या करते देखा। राजा ने उनके चरणों में वंदना कर समस्या बताई और इसका उपाय पूछा।

महर्षि अंगिरा बोले:

"हे राजन्! यह अकाल आपके पूर्वजन्म के किसी पाप या राजदंड के कारण आया है, पर इसका निवारण संभव है। आप आषाढ़ मास की शुक्ल पक्ष की एकादशी को 'देवशयनी एकादशी' नामक व्रत करें। इस दिन उपवास कर भगवान विष्णु का पूजन करें और रात्रि में जागरण करें। इस व्रत के प्रभाव से न केवल वर्षा होगी बल्कि समस्त दोष भी समाप्त हो जाएंगे।"

राजा का व्रत और फल:

राजा मान्धाता ने महर्षि के आदेशानुसार विधिपूर्वक देवशयनी एकादशी का व्रत किया। उन्होंने रात्रि में जागरण किया और भगवान विष्णु की भक्ति में लीन रहे।

व्रत पूर्ण होते ही भारी वर्षा हुई, धरती हरी-भरी हो गई, प्रजा को अन्न-जल मिला और चारों ओर समृद्धि लौट आई।


व्रत का फल और महिमा:

·         जो भक्त इस एकादशी का व्रत श्रद्धा से करता है, वह वैकुण्ठ को प्राप्त करता है।

·         इस व्रत से सभी पाप नष्ट होते हैं और जीवन में धन, ऐश्वर्य, सुख-शांति और मोक्ष की प्राप्ति होती है।

·         यह व्रत विशेषकर उन लोगों को करना चाहिए जो विवाह, संतान, सुख-समृद्धि या मानसिक शांति की कामना करते हैं।


महत्वपूर्ण श्लोक (व्रत कथा में वर्णित):

"एकादश्यां यः कुरुते व्रतं हरिं समर्चयेत्।
स याति वैष्णवं लोकं विष्णुनाभ्यर्चनं फलम्॥"

अर्थ:
जो एकादशी के दिन व्रत करता है और भगवान विष्णु की आराधना करता है, वह वैष्णव लोक में जाता है और उसे विष्णुपूजन का फल प्राप्त होता है।


 व्रत विधि:

1.  एक दिन पहले (दशमी) को सात्विक भोजन करें।

2.  एकादशी के दिन ब्रह्ममुहूर्त में उठकर स्नान करें।

3.  भगवान विष्णु की पूजा करें, तुलसी दल अर्पित करें, पीले फूल और वस्त्र चढ़ाएं।

4.  "ॐ नमो भगवते वासुदेवाय" मंत्र का जप करें।

5.  व्रतधारी दिन भर उपवास करें निर्जल या फलाहार।

6.  रात्रि में जागरण करें और भजन-कीर्तन करें।

7.  द्वादशी को ब्राह्मण या ज़रूरतमंद को दान देकर व्रत पारण करें।


देवशयनी एकादशी की धार्मिक बातें:

  • इस दिन तुलसी और शालिग्राम का पूजन विशेष पुण्यदायक होता है।
  • इसे पद्म पुराण और स्कंद पुराण में अत्यंत पुण्यदायक कहा गया है।
  • इस दिन शुरू हुए चातुर्मास में भक्त लोग मांसाहार, लहसुन-प्याज, मद्यपान, तामसिक भोजन आदि का त्याग करते हैं।

 

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